स्ट्रोक (लकवा) क्या है?

स्ट्रोक, जिसे आम बोलचाल में लकवा या पैरालिसिस भी कहा जाता है, एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति है। यह तब होती है जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह रुक जाता है (इस्केमिक स्ट्रोक) या जब मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है (हेमोरेजिक स्ट्रोक)। इसके कारण मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और वे तेजी से नष्ट होने लगती हैं, जिससे शरीर के प्रभावित हिस्सों की कार्यक्षमता चली जाती है।

स्ट्रोक के बाद मरीज को चलने-फिरने, बोलने और रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई होती है। इस स्थिति में stroke recovery hindi में फिजियोथेरेपी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय पर शुरू किया गया न्यूरो-रिहैबिलिटेशन मस्तिष्क को दोबारा काम सीखने (Neuroplasticity) में मदद करता है।

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स्ट्रोक रिकवरी के विभिन्न चरण और फिजियोथेरेपी का ध्यान

स्ट्रोक के बाद रिकवरी एक क्रमिक प्रक्रिया है। मरीज की स्थिति के अनुसार फिजियोथेरेपी के उद्देश्य भी बदलते हैं:

रिकवरी का चरणसमय सीमाफिजियोथेरेपी का मुख्य उद्देश्यप्रमुख व्यायाम और तकनीक
**1. तीव्र चरण (Acute Phase)**स्ट्रोक के पहले 1-2 सप्ताहबिस्तर पर लेटे रहने से होने वाली जटिलताओं को रोकना और अंगों की स्थिति सुधारना।- बेड पोजीशनिंग (Bed positioning)
- पैसिव रेंज ऑफ मोशन व्यायाम (Passive ROM)
- श्वसन व्यायाम (Breathing exercises)
**2. उप-तीव्र चरण (Sub-acute Phase)**2 सप्ताह से 6 महीने तकअंगों में गति वापस लाना, बैठने और खड़े होने का संतुलन बनाना।- एक्टिव-असिस्टेड व्यायाम
- बैठने और खड़े होने का अभ्यास (Balance training)
- गेट ट्रेनिंग (Gait Training) की शुरुआत
**3. पुराना चरण (Chronic Phase)**6 महीने के बादमरीज को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाना और चलने-फिरने की क्षमता को सुधारना।- बिना सहारे के चलने का अभ्यास
- मांसपेशियों को मजबूत करने के व्यायाम
- रोजमर्रा के कार्यों का अभ्यास (Functional task training)

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स्ट्रोक रिकवरी में फिजियोथेरेपी की प्रमुख तकनीकें

न्यूरो-फिजियोथेरेपिस्ट मरीज की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग तकनीकों का उपयोग करते हैं:

1. न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) को सक्रिय करना

मस्तिष्क में क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की जगह नई न्यूरल लाइन्स बनाने की क्षमता होती है, जिसे न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हैं। प्रभावित हाथ या पैर से बार-बार सही तरीके से गति करवाने से मस्तिष्क उन गतियों को दोबारा सीखता है।

2. रेंज ऑफ मोशन व्यायाम (Range of Motion Exercises)

शुरुआत में जब मरीज खुद हाथ-पैर नहीं हिला पाता, तो थेरेपिस्ट प्रभावित अंगों को खुद हिलाते हैं (Passive ROM)। इससे जोड़ों में जकड़न (contractures) नहीं होती और रक्त संचार ठीक रहता है। जैसे-जैसे मरीज में सुधार होता है, उसे खुद व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

3. संतुलन और गेट ट्रेनिंग (Balance and Gait Training)

लकवा के कारण मरीज का संतुलन बिगड़ जाता है। थेरेपिस्ट मरीज को पहले बैठकर संतुलन बनाना सिखाते हैं, फिर खड़े होने और धीरे-धीरे चलने का अभ्यास करवाते हैं। चलने के दौरान पैर को सही तरीके से जमीन पर रखने के लिए गेट ट्रेनिंग दी जाती है।

4. स्प्लिंट्स और सपोर्ट (Orthotics)

स्ट्रोक के बाद अक्सर मरीज का पैर नीचे लटक जाता है, जिसे 'फुट ड्रॉप' कहते हैं। इसे ठीक करने के लिए एंकल-फुट ऑर्थोसिस (AFO) स्प्लिंट लगाने की सलाह दी जाती है ताकि मरीज सुरक्षित रूप से चल सके।

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घरेलू देखभाल और टिप्स

अस्पताल या क्लीनिक के साथ-साथ घर पर की जाने वाली देखभाल रिकवरी को तेज करती है:

  1. पोजीशनिंग (Positioning): मरीज को बिस्तर पर लिटाते समय प्रभावित हाथ और पैर के नीचे तकिए लगाएं ताकि जोड़ों पर दबाव न पड़े। हर 2 घंटे में करवट बदलवाएं।
  2. दैनिक व्यायाम: थेरेपिस्ट द्वारा बताए गए हल्के व्यायामों को घर पर दिन में 2-3 बार दोहराएं।
  3. सुरक्षा का ध्यान रखें: गिरने से बचाने के लिए घर के फर्श को साफ और सूखा रखें। बाथरूम में ग्रैब बार (grab bars) लगवाएं।
  4. धैर्य और प्रोत्साहन: स्ट्रोक से उबरने में समय लगता है। मरीज का हौसला बढ़ाएं और उन्हें छोटे-छोटे सुधारों के लिए प्रोत्साहित करें।